कफन और दफन के मसाईल

ये पोस्ट मौत,मय्यत को ग़ुस्ल देना,उसको कफ़न पहनाना,नमाज़े जनाज़ा,मय्यत को लेकर चलना,उसको दफ़्न करना और ताज़ियत के तअल्लुक़ से है

मय्यत को दफ़्न करना


कफन और दफन के मसाईल

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     मौत
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*ⓩ मौत,वो सच्चाई है कि जिसके बारे में किसी भी धर्म या मज़हब में इख्तिलाफ नहीं है,क़ुर्आन फरमाता है "हर जान को मौत का मज़ा चखना है" यानि दुनिया व जहान में जो कुछ है सब कुछ एक न एक दिन फ़ना होना है बाक़ी रहने वाली ज़ात सिर्फ एक अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की है,हदीसे पाक में आता है कि "मौत को कसरत से याद करो" यहां याद करने से मुराद दुनिया से ग़फ़लत इख़्तियार करके आख़िरत की तैयारी करना है ये नहीं कि ज़रा सी परेशानी आन पड़ी तो लगे मौत की दुआ करने हां अगर इस तरह कहे कि "ऐ मौला जब तक ज़िन्दगी मेरे लिए बेहतर है मुझे ज़िंदा रख और जब मौत बेहतर हो तो मुझे मौत अता फरमा" तो ऐसा कहना जायज़ है और ये भी आता है कि बंदा जैसा अपने रब पर ग़ुमान रखता है उसे वैसा ही मिलता है लिहाज़ा अपने रब पर अच्छा ग़ुमान रखे,हदीसे पाक में आता है कि "वो मुराद को पहुंचा जिसका खातिमा खैर से हुआ" यानि ज़िन्दगी भर के सारे आमाल का दारो मदार खात्मे पर है,आईये अब चलते हैं फुक़्हा के अक़वाल व मसायल की तरफ*

*फुक़्हा* - जब मौत का वक़्त आ जाए और अलामतें पाई जाए तो सुन्नत है कि उसको दाहिनी करवट पर लिटा दें कि मुंह क़िब्ले की जानिब हो जाए या चित लिटाकर पांव को क़िब्ले की जानिब कर दें मगर सर को पैर की बनिस्बत ऊंचा रखें कि इस तरह भी मुंह क़िब्ले की जानिब हो जायेगा और अगर दुशवारी हो तो जिस हालत पर चाहें छोड़ दें

*फुक़्हा* - युंही जांकनी की हालत में उसके पास बा आवाज़ बुलन्द कल्मा शरीफ पढ़ें कि वो सुनकर पढ़े मगर उसे पढ़ने का हुक्म न दें कि हो सकता है कि मआज़ अल्लाह हालते नज़अ में इंकार करदे कि ये बुरा होगा मगर हुक्मे कुफ़्र फिर भी नहीं लगायेंगे कि ऐसी हालत में अक़्ल मौक़ूफ़ हो जाती है

*फुक़्हा* - फिर जब वो कल्मा पढ़ले तो तलक़ीन रोक दें हां अगर कुछ और बात करले तो फिर तलक़ीन करें कि आखिरी कल्मा उसकी ज़बान से जो निकले वो "ला इलाहा इललल्लाह मुहम्मदुर रसूल अल्लाह لا إله إلا الله محمد رسول الله " ﷺ हो,तलक़ीन करने वाला नेक और परहेज़गार हो,बेहतर है कि सूरह यासीन शरीफ पढ़ी जाती हो और खुशबु वग़ैरह से मकान महका दें

*फुक़्हा* - हैज़ व निफ़ास वाली औरतें पास रह सकती हैं लेकिन हैज़ बंद हो चुके और अभी ग़ुस्ल नहीं किया है या जुनुब है तो दूर रहे और कोशिश करें कि मकान में कुत्ता या जानदार की तस्वीर न हो क्योंकि इनके रहने से रहमत के फ़रिश्ते घर में नहीं आते,और उसके लिए दुआए खैर करता रहे कि फ़रिश्ते उसकी दुआओं पर आमीन कहते हैं लिहाज़ा बुरी बातों से परहेज़ करें

*फुक़्हा* - जब रूह निकल जाए तो एक चौड़ी पट्टी से जबड़े के नीचे से सर पर ले जाकर गिरह लगा दें कि मुंह न खुलने पाये और आंखें बन्द कर दें और हाथ पांव नरमी के साथ सीधा कर दें और पेट पर लोहा या गीली मिटटी या कोई भारी चीज़ रख दें कि पेट फूल न जाए मगर ज़रूरत से ज़्यादा वज़नी न हो कि बाईसे तक़लीफ़ है

*फुक़्हा* - मय्यत के सारे बदन को किसी कपड़े से छिपा दें और उसको चारपाई या तख़्त पर लिटा दें कि ज़मीन की नमी ना पहुंचे

*फुक़्हा* - अगर उसके ज़िम्मे क़र्ज़ हो तो फ़ौरन क़र्ज़ अदा करें कि हदीसे पाक में आता है कि शहीद भी उस वक़्त तक आगे नहीं बढ़ सकेगा जब तक कि उसके क़र्ज़ का हिसाब किताब न हो जाए लिहाज़ा अगर उसने माल छोड़ा है तो उसके माल से क़र्ज़ अदा करें वरना वरसा अपने माल से अदा करें

*फुक़्हा* - मय्यत के पास तिलावत या ज़िक्रो अज़कार बिला शुबह जायज़ है,ग़ुस्लो कफ़न में जल्दी करने की हदीस में बहुत ताक़ीद आई है लिहाज़ा जल्दी करें,अहबाब व रिश्तेदारों को इत्तेला करें कि नमाज़ियों की कसरत होगी युंही मय्यत की खबर देने के लिए ऐलान करना भी जायज़ है मगर उसके लिए बड़े बड़े आदाबो अलक़ाब न पुकारे जायें

*फुक़्हा* - औरत मर गयी और बच्चा पेट में जिंदा है तो बाएं जानिब से पेट चीरकर बच्चा निकाला जाए और अगर औरत ज़िंदा है और बच्चा मर गया तो बच्चे को काटकर भी निकाल सकते हैं और औरत और बच्चे दोनों जिंदा हैं तो कैसी भी तक़लीफ़ क्यों न हो बच्चे को काट कर नहीं निकाल सकते

*फुक़्हा* - अगर जबरन इसने किसी का माल निगल लिया और मर गया तो अगर माल छोड़ा है तो माल से तावान दें और नहीं तो पेट चीर कर माल निकाल लें और सहवन निगल लिया था तो न चीरा जाए

*फुक़्हा* - हामिला औरत मर गयी और किसी ने ख्वाब देखा कि बच्चा हुआ है तो सिर्फ ख्वाब की बिना पर क़ब्र खोदने की इजाज़त नहीं

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     मय्यत को नहलाना

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*मसअला* - ग़ुस्ल देने के लिए ज़रूरत की चीज़ें ये हैं 1-पाक पानी बेहतर है कि हल्का गर्म हो 2-पाक मिट्टी या पाक साबुन 3-बैर के पत्ते बेहतर है कि इसको पानी में धोकर खूब खौला लें और हस्बे ज़रूरत ग़ुस्ल देने के पानी में मिलाते रहें 4-कपड़े के कुछ टुकड़े या रुई 5-हाथ में लपेटने के लिए कपड़ा या दस्ताने 6-तीन मोटी चादरें पर्दा करने के लिए अगर औरत हो तो वरना मर्द के लिए पर्दे की हाजत नहीं 7-काफूर इसको एक बर्तन में घोलकर पानी में खूब अच्छी तरह मिला लें (और ये चीज़ें मुस्तहब हैं अगर मिले तो बेहतर वरना सिर्फ पानी से भी ग़ुस्ल हो जायेगा)

*मसअला* - मय्यत को नहलाना फर्ज़े किफ़ाया है यानि बअज़ लोगों ने ग़ुस्ल दे दिया तो सब बरी हो गए

*मसअला* - अगर मर्द है तो मर्द और अगर औरत है तो औरत ग़ुस्ल दे,अगर छोटा लड़का है तो औरत नहला सकती है युंही लड़की छोटी है तो मर्द ग़ुस्ल दे सकता है,छोटी से मुराद हद्दे शहवत को न पहुंची हो,युंही बीवी अपने शौहर को ग़ुस्ल दे सकती है मगर तब ही जबकि उसके निकाह में रही हो वरना तलाक़ दी हो या मआज़ अल्लाह मुर्तद हो गयी हो तो इस सूरत में अजनबिया हो चुकी अब नहीं नहला सकती,तलाके रजाई दी और इद्दत के अंदर शौहर का इंतकाल हुआ तो भी ग़ुस्ल दे सकती है लेकिन बाईन तलाक़ दी तो नहीं नहला सकती

*मसअला* - औरत मर गयी तो उसका शौहर उसे ग़ुस्ल नहीं दे सकता न छू सकता है,हां देख सकता है और अवाम में जो ये मशहूर है कि न तो देख सकता है और न कन्धा दे सकता है ये महज़ बे अस्ल है,इसी तरह अगर कपड़ो के ऊपर से उसके बदन को हाथ लगाता है तो भी मुमानियत नहीं

*मसअला* - औरत का इंतेक़ाल हुआ और कोई औरत नहीं कि ग़ुस्ल दे सके तो तयम्मुम कराया जाए अब अगर महरम है तो हाथ से और अगर ग़ैर मेहरम है या शौहर है तो हाथ पर कपड़ा लपेटकर तयम्मुम कराये,ग़ैर महरम हाथ की तरफ नज़र न करे और शौहर को इसकी मनाही नहीं और जवान व बुढ़िया की कोई क़ैद नहीं,युंही मर्द का इंतकाल हुआ और मर्द नहीं कि ग़ुस्ल दे सके तो औरत उसे तयम्मुम कराये अगर महरम है तो ऐसे ही और ग़ैर मेहरम है तो हाथ पर कपड़ा लपेटकर

*मसअला* - जिस्म का आधा या इससे ज़्यादा टुकड़ा मिला तो ग़ुस्लो कफ़न नमाज़ सब पढ़ी जायेगी बाद को आधा भी मिला तो उसको ऐसे ही कपड़े में लपेटकर दफन कर दें

*मसअला* - मुर्दा मिला अगर अगर शनाख्त होती हो मसलन वज़अ क़तअ से या मुसलमानों के मोहल्ले में या क़रीब मिला या ऐसी अलामत ज़ाहिर हो कि मुसलमान है तो ग़ुस्लो कफ़न और नमाज़ सब की जाए और पहचान न होती हो तो ऐसे ही कपड़े में लपेटकर दफन कर दें फिर बाद को पता चले कि मुसलमान था तो 3 दिन के अंदर क़ब्र पर नमाज़ पढ़ें इसके बाद इजाज़त नहीं

*मसअला* - मय्यत का बदन ऐसा हो गया हो कि हाथ नहीं लगा सकते तो बिना हाथ लगाये सिर्फ पानी बहा दिया जाए

*मसअला* - नहलाने के बाद कंघी करना नाख़ून काटना दाढ़ी बनाना जायज़ नहीं कि जिस हालात पर हो उसी तरह दफन किया जाए

*मसअला* - दोनों हाथों को करवटो में रखें सीने पर न रखें और न ही नाफ के नीचे बांधे

*मसअला* - बअज़ जगह दस्तूर है कि ग़ुस्ल के लिए नए घड़े या बंधने लाये जाते हैं इसकी ज़रूरत नहीं कि घर के बर्तन से ग़ुस्ल कराया जा सकता है फिर बअज़ जगह उस घड़े या बंधने को तोड़ डालते है ये नाजायज़ो हराम है कि पैसे की खराबी है,और ये सोचना कि मय्यत को ग़ुस्ल देने के बाद वो नजिस हो गए तो ये हिमाकत है कि अव्वल तो जिस्म से जुदा हुआ पानी मुशतमिल के हुक्म में है और अगर नजिस हुआ भी हो तो भी पानी से धोने पर नजासत पाक हो जाती है,बअज़ जगह घर का पानी फेंक देते हैं ये भी हराम है और उन बर्तनों को घर रखने को नहूसत समझना भी निरा जिहालत है

*तरीक़ा - किसी तख्ते को पानी से धुलकर उसपर मय्यत को लिटा दें और तख़्त के सरहाने ईंट लगाकर थोड़ा सा ऊंचा कर दें,अगर मर्द है तो नाफ से लेकर घुटनों तक और अगर औरत है तो पूरा जिस्म ढककर ग़ुस्ल दिया जाए,तरीक़ा ये है कि ग़ुस्ल देने वाला सबसे पहले हाथों पर कपड़ा लपेटकर इस्तिंजा कराये फिर नमाज़ का सा वुज़ू कराये यानि पहले मुंह फिर कुहनियो तक हाथ धोये फिर सर का मसह कराये फिर पांव धोये,किसी कपड़े या रुई की फरेरी भिगोकर दांतों और मसूड़ों और होठों और नथुनो पर फेर दें फिर अगर सर और दाढी के बाल हो तो गुल खेरू से धोये ये न हो तो कोई पाक साबुन से धोया जाए,फिर बाईं करवट पर लिटाकर सर से पांव तक बैरी का पानी बहायें कि तख़्त तक पहुंच जाए फिर दायीं करवट पर लिटाकर ऐसा ही करें,फिर आखिर में सर से पांव तक काफूर का पानी बहायें और फिर पूरे बदन को नरमी के साथ किसी कपड़े से सुखा लें*

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       मय्यत को कफ़न पहनाना

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*मसअला* - मय्यत को कफ़न देना फर्ज़े किफ़ाया है और इसके 3 दर्जे हैं 1-ज़रूरत 2-किफ़ायत 3-सुन्नत,मर्द के लिए सुन्नत 3 कपड़े हैं लिफ़ाफ़ा अज़ार और क़मीस और औरत के लिए 3 यही और दो में ओढ़नी और सीना बंद,और अक्सर यही इस्तेमाल किया जाता है और जहां इसके अलावा इस्तेमाल हो तो कम से कम इतना हो सारा बदन ढक जाये 

*मसअला* - लिफाफा यानि चादर,इसकी मिक़्दार ये है कि मय्यत के क़द से इतना ज़्यादा हो कि दोनों तरफ गिरह लगा सकें,और अज़ार यानि तहबन्द की मिक़्दार चोटी से क़दम तक,और क़मीस जिसको कफनी कहते हैं उसकी मिक़्दार गरदन से घुटनों के नीचे तक और ये आगे और पीछे दोनों तरफ से बराबर हो और जाहिलो में जो ये रिवाज है कि पीछे से कम रखते हैं ये गलती है,मर्द व औरत की कफनी में फर्क है मर्द की कफनी मूंढों पर चीरे और औरत की सीने की तरफ,ओढ़नी तक़रीबन 1.5 गज़ और सीना बंद पिस्तान से नाफ तक बल्कि रान तक ज़्यादा बेहतर है

*मसअला* - कफ़न का कपड़ा ऐसा होना चाहिए जैसा कि मर्द जुमा व ईदैन में और औरत अपने मायके जाते हुए पहनती हो यानि कीमती,और सफ़ेद हो कि ये बेहतर है

*तरीक़ा - मय्यत के बदन को सुखाने के बाद कफ़न को खुश्बू वगैरह की धूनी ले लें फिर कफ़न युं बिछायें कि बड़ी चादर फिर तहबन्द फिर कफनी को खोल लें फिर मय्यत को लिटाएं फिर कफनी पहनाएं और दाढ़ी और तमाम बदन पर खुशबु काफूर वग़ैरह मलें खासकर पेशानी नाक हाथ घुटना क़दम वगैरह,फिर तहबन्द लपेटें कि पहले बायीं जानिब से फिर दायें जानिब से फिर इसी तरह लिफ़ाफ़ा करें पहले बायें फिर दायें कि दायां पल्ला ऊपर रहे,औरत को कफनी पहनाने के बाद उसके बाल के 2 हिस्से करके कफनी के ऊपर सीने पर डाल दें,और ओढ़नी निस्फ़ पुश्त के नीचे से बिछाकर सर पर लाकर मुँह पर मिस्ल नक़ाब के डाल दें कि सीने पर रहे फिर उसके ऊपर सीना बंद पिस्तान से रान तक बांधे फिर लिफाफा,उसके बाद सिर और पैर की तरफ से फूल गिरह लगा दें कि इसे क़ब्र में लिटाकर खोलना होगा,हिंदुस्तान में कफन मसनून के साथ एक चादर जो कि सबसे ऊपर डाली है और एक जा नमाज़ भी होती है जिसपर इमाम नमाज़ पढ़ता है इसे सदक़ा कर दिया जाता है इसमें हर्ज़ नहीं*

    जनाज़ा लेकर चलना

*मसअला* - जनाज़े को कंधा देना इबादत है और इसमें कोताही न करें कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से कांधा देना साबित है,बेहतर है कि 4 लोग जनाज़ा उठायें और जगह तंग है या कोई और मजबूरी तो 2 लोग भी उठा सकते हैं,बेहतर है कि पहले दाएं सिरहाने फिर दाएं पैर की तरफ फिर बायें सिरहाने और फिर बाएं पैर की तरफ से कन्धा दे और बार 10 क़दम चले कि फरमाया गया कि जो मय्यत के साथ 40 क़दम चलेगा उसके 40 कबीरह गुनाह माफ़ कर दिए जायेंगे,चौपाये या गाड़ी पर जनाज़ा ले जाना मकरूह है लेकिन काफी दूर जाना है तो हर्ज़ नहीं,जनाज़ा थोड़ा तेज़ी से लेकर चलें मगर इतना नहीं कि मय्यत को तकलीफ हो और चलने वाले पीछे चलें न कि दाएं बाएं और आगे चलता हो तो काफी आगे हो ताकि उसमे शुमार न हो,सवारी के साथ चलने का भी यही हुक्म है कि इतना आगे हो कि जनाज़े में शुमार न हो,औरतें जनाज़े के साथ न जाएं,ख़ामोशी के साथ चलें मगर अब बा लिहाज़ ज़माना उल्मा ने ज़िक्रे बिल जहर की इजाज़त दी है कि फ़ालतू बातें करने से तो ज़िक्रुल्लाह करना बेहतर है,जनाज़ा जब तक क़ब्रिस्तान में रखा न जाए बैठे नहीं और जब रख दिया जाए तो बिला ज़रूरत खड़े न रहे,युंही किसी का जनाज़ा आता देखें तो खड़े होने की हाजत नहीं हां साथ में जाना हो तो और बात है,जब मय्यत रखें तो क़िब्ला दायें करवट हो,जनाज़े के साथ जाना नफ़्ल नमाज़ पढ़ने से बेहतर है और बेहतर है कि नमाज़े जनाज़ा पढ़े बगैर वापस न लौटें

       नमाज़े जनाज़ा

*मसअला* - नमाज़े जनाज़ा फर्ज़े किफ़ाया है कि एक ने पढ़ली तो सब बरी हो गए और एक ने भी नहीं पढ़ी तो जिसको जिसको खबर पहुंची थी सब गुनाहगार हुए

*मसअला* - इसकी फर्ज़ियत का इनकार करना कुफ़्र है और इसके लिए जमाअत शर्त नहीं बल्कि तन्हा भी पढ़ली तो हो गयी

*मसअला* - नमाज़ पढ़ने के लिए वही शरायत हैं जो दीगर नमाज़ों के हैं जैसे क़ादिर होना आक़िल बालिग़ मुसलमान होना नजासत से कपड़े और जगह का पाक होना सतरे औरत क़िब्ला की तरफ़ मुंह होना और नियत,इसमें वक़्त शर्त नहीं और तकबीरे तहरीमा फर्ज़ नहीं बल्कि रुक्न है

*मसअला* - बअज़ लोग जूता पहने हुए औए बअज़ जूते पर खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हैं तो अगर जूता पहने है तो जूता और ज़मीन दोनों का पाक होना ज़रूरी है और जूता उतारकर उसपर खड़ा हो गया तो सिर्फ जूते का पाक होना काफी है

*मसअला* - जनाज़ा तैयार है कि वुज़ू करेगा तो नमाज़ नहीं मिलेगी तो तयम्मुम करके नमाज़ पढ़े

*मास'ला* - बच्चा ज़िंदा पैदा हुआ और मर गया तो नमाज़ पढ़ी जाएगी और मुर्दा पैदा हुआ तो नमाज़ नहीं

*मसअला* - मुसलमान को छोटा बच्चा मिला और बाद को मर गया तो नमाज़ पढ़ी जाएगी,युंही छोटे बच्चे के माँ-बाप में से कोई एक मुसलमान हो तो बच्चे की नमाज़ पढ़ी जाएगी और दोनों काफ़िर हैं तो नहीं

*मसअला* - चंद मुसलमानों को छोड़कर हर किसी की नमाज़ पढ़ी जाएगी अगर चे कैसा भी गुनहगार हो और जिनकी नमाज़ नहीं पढ़ी जायेगी वो ये हैं

1. डाकू कि डाका डालते वक़्त मारा गया तो न ग़ुस्ल है न नमाज़ और पकड़ा गया फिर सज़ा के तौर पर मारा गया या बग़ैर डाका डाले हुए घर में मर गया तो ग़ुस्ल और नमाज़ दोनों है 

2. बाग़ी जो इमाम बर हक़ के खिलाफ लड़े उसकी भी नमाज़ नहीं 

3. जिसने कई लोगों का गला घोंट कर मार डाला उसकी नमाज़ नहीं 

4. जिसने अपने माँ-बाप को मार डाला उसकी भी नमाज़ नहीं

5. जो किसी का माल छीनता हो और मारा जाए उसकी भी नमाज़ नहीं 

*मसअला* - खुदकुशी करना हराम है मगर नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जाएगी

*मसअला* - बगैर ग़ुस्ल दिए नमाज़ पढ़ी तो अगर क़ब्र में नहीं उतारा है तो फिर से ग़ुस्ल देकर नमाज़ पढ़ें और मिटटी दे चुके तो लाश न निकालें बल्कि अब क़ब्र पर नमाज़ पढ़ें 

*मसअला* - मय्यत का सामने होना भी ज़रूरी है यानि ग़ायब की नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जाएगी

*मसअला* - अगर कई मय्यत एक साथ आ गयी तो सबकी नमाज़ साथ में पढ़ी जा सकती है पहले मर्दो का जनाज़ा रखा जाए फिर मर्द बच्चों का फिर उसके बाद औरतों का

*मसअला** - नमाज़े जनाज़ा में 2 रुक्न है पहला 4 बार तकबीर बोलना और दूसरा क़याम करना और 3 सुन्नते मुअक़्क़िदह है पहली अल्लाह की हम्दो सना दूसरा हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर दुरूद पढ़ना और तीसरा मय्यत के लिए दुआए मग़फिरत करना

*तरीक़ा - पहली तकबीर अल्लाहु अकबर कहता हुआ कानो तक हाथ उठाये और नाफ के नीचे बांध ले और सना पढ़े (जो दीग़र नमाज़ो में पढ़ते हैं वो ही पढ़ सकते हैं) फिर दूसरी तकबीर कहे और दुरूद पढ़ें (दुरूदे इब्राहीम यानि नमाज़ वाला दुरूद पढ़ें या जो भी याद हो पढ़ें) फिर तीसरी तकबीर कहे और मय्यत के लिए दुआ करें (दुआ- अल्लाहुम्मग़ फ़िर लिहइइना वमइं इतिना व शाहिदिना व ग़ाइबिना व सग़ीरिना व कबीरिना व ज़ाकरिना व उनसाना अल्लाहुम्मा मन अहयइतुहु मिन्ना फअहयिही अलल इस्लाम वमन तवफइतहु फ़तावफ्फहु अलल ईमान اللهم أغفر لحينا وميتنا وشاهدنا وغائبنا وصغيرنا وكبيرنا وذكرنا وانثانا اللهم من أحييته منا فا أحيه على الإسلام ومن توفيته منا فتوفه على الإيمان   , ये दुआ बालिग़ मर्द व औरत दोनों के लिए पढ़ी जाती है और नाबालिग़ लड़के के लिए दूसरी दुआ है और नाबालिग़ लड़की के लिए अलग दुआ,मगर यही दुआ सभी के लिए पढ़ी जा सकती है इसमें हर्ज़ नहीं,इसके अलावा भी बहुत सारी दुआएं हैं मगर जो भी पढ़ें उसमे उमूरे आख़िरत का ज़िक्र हो) और चौथी तकबीर के बाद हाथ खोलकर बगैर कुछ पढ़े सलाम फेर दें और नियत मय्यत फ़रिश्तों और हाज़िरीने नमाज़ की करें*

*मसअला* - पहली तकबीर के वक़्त ही हाथ उठाना है बाकियों में नहीं और बअज़ लोग हर तकबीर में आसमान की तरफ मुंह उठाते हैं ये भी जायज़ नहीं कि इसकी सख्त मुमानियत आई है

*मसअला* - नमाज़े जनाज़ा में पिछली सफ को तमाम सफों से ज़्यादा फ़ज़ीलत है हदीसे पाक में आया कि जिसकी नमाज़ में 3 सफ होगी उसकी मग़फिरत हो जायेगी लिहाज़ा अगर किसी की मय्यत में 6 ही लोग हों तो पहली सफ में 3 लोग और दूसरी में 2 और तीसरी में 1 शख़्स खड़ा होकर नमाज़ पढ़े कि 3 सफ हो जाए

*मसअला* - बग़ैर वली की इजाज़त के नमाज़ न पढ़ाई जाए हां कोई वली न हो तो हर्ज़ नहीं युंही बिना इजाज़त पढ़ाई या वली मौजूद न था तो बाद को आकर अपनी नमाज़ पढ़ सकता है और अगर मय्यत दफ्न हो चुकी तो क़ब्र पर पढ़े मगर 3 दिन के अंदर उसके बाद इजाज़त नहीं

*मसअला* - कुंअे में गिरकर मर गया कि लाश नहीं निकाली जा सकती या मकान के नीचे दब गया तो वहीं नमाज़ पढ़ दें लेकिन दरिया में डूब गया तो नमाज़ नहीं कि मुसल्ली का आगे होना मअलूम नहीं 

*मसअला* - मस्जिद के अंदर नमाज़े जनाज़ा पढ़ना जायज़ नहीं ख़्वाह किसी की हो

*मसअला* - बच्चा ज़िंदा पैदा हो या मुर्दा ख्वाह नमाज़ पढ़ी जाए या नहीं मगर उसका नाम रख दें कि क़यामत के दिन उसका हश्र तो होगा

        मय्यत को दफ़्न करना

*मसअला* - मय्यत को दफ़्न करना फ़र्ज़े किफ़ाया है और ये जायज़ नहीं कि ज़मीन पर रखकर चारों तरफ से दीवारें उठा दें

*मसअला* - जिस जगह इंतेक़ाल हुआ उस जगह दफ्न करना भी मुनासिब नहीं कि ये खसाईस सिर्फ अंबिया अलैहिस्सलाम को हासिल है

*मसअला* - क़ब्र 2 किस्म की होती है पहली लहद ये सुन्नत है और दूसरी संदूक़ जो कि हिंदुस्तान में रायज है

*मसअला* - क़ब्र के अन्दर चटाई वग़ैरह बिछाना फ़िज़ूल है जायज़ नहीं युंही लकड़ी के संदूक में दफ़न करना भी मुनासिब नहीं

*मसअला* - क़ब्र में उतारने वाले 2-3 लोग हो सकते हैं कोई क़ैद नहीं मगर बेहतर है कि नेक व सालेह हों और जानकार हों और औरत के लिए बेहतर है कि महरम हों वरना अजनबी भी हो सकते हैं

*मसअला* - क़ब्र में उतारते वक़्त क़िब्ला की जानिब से मय्यत को लाएं और ये दुआ पढ़ें "बिस्मिल्लाहि व बिल्लाहि वआला मिल्लती रसूलुल्लाही بسم الله وبا الله وعلى ملة رسول الله  "

*मसअला* - मय्यत को दाहिने करवट पर हल्का सा कर दें और उसका चेहरा क़िब्ला रुख कर दें और उसके कफ़न की गिरह खोल दें

*मसअला* - अगर लहद है तो कच्ची ईंटो से उसको बंद कर दें पक्की ईंटे न लगाएं कि ये आग से पकाई जाती हैं और क़ब्र में आग का दाखिल करना हरगिज़ बेहतर नहीं,और अगर संदूक़ है तो लकड़ी के तख्तों से बन्द करके मिटटी दें

*मसअला* - मिट्टी सरहाने की तरफ से 3 बार डालें पहली बार में ये दुआ पढ़ें "मिन्हा ख़लक़नाकुम  منها خلقناكم" दूसरी बार "वफ़ीहा नुईदुकुम  وفيها نعيدكم" और तीसरी बार "वमिन्हा नुख़रिजुकुम तारतन उख़रा  ومنها نخرجكم تارة اخرى"

*मसअला* - हाथ में जो मिटटी लगी है उसे झाड़ दें या धो दें इख़्तियार है

*मसअला* - पानी के जहाज़ में इंतेक़ाल हुआ और किनारा क़रीब न हो तो ग़ुस्लो कफ़न व नमाज़ पढ़कर समंदर में डुबो दें

*मसअला* - उल्मा व सादात की क़ब्रों को पक्की करने में हर्ज़ नहीं और निशानी तो आम मुसलमानों की क़ब्रों में भी लगाना जायज़ है और बेहतर है कि सालेहीन के आस पास दफ़्न करें कि उनकी बरकत से इसपर भी रहमत होगी

*मसअला* - दफ़्न के बाद मुस्तहब है कि सरहाने खड़े होकर अलिफ लाम मीम से मुफ़लिहून तक और पायंती की जानिब आमनर रसूल से ख़त्म तक पढ़ी जाए

*मसअला* - दफ्न करने के बाद इतनी देर वहां ठहरें कि जितनी देर में ऊँट ज़बह करके उसका गोश्त तकसीम किया जा सकता हो कि ये घर मय्यत के लिए नया नया है और हर नयी जगह जाने में बन्दे को हिचकिचाहट होती ही है फिर थोड़ी देर में दिल लग जाता है लिहाज़ा ठहरें और तलक़ीन करते रहें

*मसअला* - बिला ज़रूरत एक क़ब्र में 2 मुर्दे को रखना जायज़ नहीं हां ज़रूरत हो मसलन जगह कम है या कुछ और तो दोनों के दरमियान मिट्टी की दीवार उठाकर एक क़ब्र में दफ़न कर दें

*मसअला* - क़ब्र पर बैठना सोना चलना टेक लगाना हराम है,युंही अगर किसी अज़ीज़ की क़ब्र तक जाना चाहता है और बीच में क़ब्रे मौजूद हैं तो इजाज़त नहीं कि वहीं से फ़ातिहा पढ़े

*मसअला* - क़ब्रिस्तान में जो नया रास्ता बना हो उसपर चलना नाजायज़ो हराम है बिला शुबह वो क़ब्रो पर ही बना होगा हां पुराने रास्ते जो क़दीमी हैं उनपर चलने में हर्ज़ नहीं 

*मसअला* - क़ब्रिस्तान वो जगह है जहां जाकर इंसान को अपनी आख़िरत याद आती है लिहाज़ा इसका लिहाज़ मलहूज़ रखें और सिवाये ज़िक्रो अज़कार व दुरूदो तिलावत के फ़िज़ूल बातों में न पड़ें बल्कि ज़रूरत न हो तो अपने मोबाईल वगैरह भी स्विच ऑफ कर दें


       ताज़ियत करना

*मसअला* - ताज़ियत दफ़्न से पहले भी की जा सकती है मगर बेहतर बाद दफ्न है मगर 3 दिन के अंदर अंदर उसके बाद मकरूह है

*मसअला* - मय्यत के पड़ोसी या रिश्तेदार खाना लाकर मय्यत के घर वालों को खिलाएं ये जायज़ व बेहतर है मगर इतना ही कि जितना घर वालो को काफी हो वो भी सिर्फ मय्यत वाले दिन दूसरे दिन नहीं

*मसअला* - तीजा चालीसवां करना जायज़ बल्कि बेहतर है कि ईसाले सवाब का ही एक तरीका है मगर इसको तफाखुर के तौर पर करना यानि दावत की शक्ल दे देना ये जायज़ नहीं,और ये खाना भी ग़रीबों व मिस्कीनों के लिए है इसको ग़नी न खाये,लेकिन ग़नी ने खा लिया तो ये कोई नाजायज़ो हराम नहीं हां परहेज ज़रूरी है

*मसअला* - सोग 3 दिन से ज़्यादा जायज़ नहीं मगर औरत अपने शौहर के लिए 4 महीना 10 दिन सोग कर सकती है मगर इस दौरान भी गिरेहबान फाड़ना चीख चीखकर रोना सीना कोबी करना हरगिज़ जायज़ नहीं हां आवाज न निकले बल्कि आंसू बहे तो ऐसे रोने में हर्ज़ नहीं बल्कि खुद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने बेटे हज़रत इब्राहीम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की वफ़ात पर बुका फरमाया 

📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 4,सफह 129-171

*ⓩ कोशिश भर मसायल बयान कर दिए गए हैं जिसको इससे भी ज़्यादा की तफसील दरकार हो वो बहारे शरीयत के चौथे हिस्से का मुताआला करें,ईसाले सवाब करना बिला शुबह जायज़ व दुरुस्त है और उसका फ़ायदा मय्यत को पहुंचता है इसकी पोस्ट सुन्नी और मज़ार के नाम से बनी है,क़ब्र में शजरा रखना अहद नामा रखना या मय्यत की पेशानी या कफ़न पर दुआ या अज़कार रखना या लिखना जायज़ है

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