29 सित॰ 2017

मोहर्रम और आशूरा का रोजा

Moharram Aur Ashure ka Roza


मोहर्रम और आशूरा का रोजा


  मोहर्रम का महीना निहायत अजमत और तकद्दुस का हामिल है. इस महीने में अल्लाह तआला की तजल्लियात रहमत और खुसूसी इनायतों का नुजूल होता है.यही वजह है कि पिछली उम्मतों में भी इस महीने और खासकर यौमे आशूरा को इज्जत व वकार की नजरों से देखा जाता था। 

इस मुबारक महीने से सन हिजरी का आगाज होता है. यह हुरमत के चार महीनों में से एक है.

अल्लाह तआला का इरशाद है- महीनो की गितनी अल्लाह के नजदीक अल्लाह की किताब में बारह है.उसी दिन से जब आसमान और जमीन को उसने पैदा किया है

हजरत अबू बक्र (रजि०) से रिवायत है कि नबी करीम (ﷺ) ने इरशाद फरमाया- साल में बारह महीने होते है उसमें से चार हुरमत वाले हैं, तीन एक के बाद एक जि लकदा, जिलहिज्जा, मोहर्रम और (कबीला) मुजिर का रजब है जो जमादी उल ऊला व आखिर और शाबान के बीच में है
📚 *बुखारी शरीफ*


मोहर्रम का नाम मोहर्रम इसी वजह से रखा गया है कि वह हुरमत वाला महीना है. इसकी हुरमत की ताकीद के लिए मोहर्रम से पुकारा जाता है.

*मोहर्रम में नफिली रोजो की कसरत*

 इस महीने की फजीलत के पेशेनजर इसमें रोजे की भी कसरत रखनी चाहिए इसलिए नबी करीम (ﷺ) का इरशाद है- सबसे अफजल रोजा (रमजान के बाद) अल्लाह के महीने मोहरम का रोजा है
📚 *मुस्लिम शरीफ*


और याद रहे ये गम का महीना नहीं है,अल्लाह तआला ने ये महीने को जब से दुनिया पैदा की तब से अजमत वाला महीना करार दिया है,करबला का पैगाम गम मनाना नहीं है इसका  जानो इसका पैगाम तो ये है
*नमाज को ना छोड़ना,सब्र करना,गुनाह के सामने सर कटाना लेकिन झुकाना नहीं ये है*
अल्लाह तआला के वास्ते इस मैदान के सही पैगाम को जानो और
*अल्लाह ने कहा है  कुरआन में की शहिद को मुर्दा ना कहो हमने उनको मकाम अता किया है और वो कैसे वो अल्लाह ही बेहतर जानता है,*


तो ये गम मनाना,काले कपड़े का पहनना,ताजिया निकालना, मोहर्रम के मनाने मे नमाज को छोड़ना,औरतों का बेपरदह बाहर निकालना ये कोनसी शरीयत है क्या इससे हजरत इमाम हुसैन (र.अ) के रुह को खुशी मिले

हम तो मुसलमान है हमें तो वो पैगाम को लेना है जो उन्होंने करबला के मैदान में हमे सिखाया है हम उनसे मोहब्बत करते है हम तो उनका दामन कभी नहीं छोड़ेंगे
लेकिन मेरे भाइयों ये क्या हाल है हमारा की हम नाम हजरत इमाम हुसैन का लेते है और दामन यजिद का पकड़ते है.

अरे हम तो मोहब्बत जिससे करते है तो उसकी तरह बनना चाहते है तो ये कैसी मोहब्बत है?

की हम कहते है की हजरत हुसैन से मोहब्बत करते है और यजिद पे लानत भेजकर भी उसकी तरह बने बैठे हुए है
हमारे कितने भाई है जो अल्लाह तआला ने सब कुछ अच्छा देकर भी नमाज को छोड़ते है,

क्या हजरत हुसैन को जन्नत की सरदारी इस शहादत की वजह से मिली थी जब वो अपनी माँ की गोद में दूध पीते थे तभी अल्लाह के रसूल ने फरमाया था की हसन और हुसैन जन्नत के जवानो के सरदार है तो ये अगर करबला की जंग में नमाज भी ना पढ़ते तो उनके लिए जन्नत वाजिब थी,लेकिन आखिर तक नमाज को नहीं छोड़ा यहाँ तक की नमाज में शहीद हो गए, 

ये काफिले ने अल्लाह को नमाज पढ़कर दिखा दिया की जेरे खंजर भी चले सीने पे लेकिन हम तेरे लिए जान लूटा देंगे,तो में या हमारे भाई या मस्तुरात काम की वजह से,पढ़ाई के वजह से,तिजारत की वजह से नमाज को कैसे छोड सकते है,जरा सोचो 🤔
 *ऐसा क्यों आखिर?.......*


*अल्लाह तआला से दुआ करे की अल्लाह हमको करबला के मैदान का सही पैग़ाम दिल में बिठाए*
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